राजकोषीय घाटे को समझना: परिभाषा, सूत्र और प्रभाव

राजकोषीय घाटा वित्तीय बाजार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है. राजकोषीय घाटे का अध्ययन करके आप देश के समग्र वित्तीय स्वास्थ्य का पता लगा सकते हैं.

राजकोषीय घाटा आर्थिक चर्चाओं और नीतिगत बहसों में बार-बार चर्चा किया जाने वाला विषय है. यह सरकार के  व्यय की तुलना में  राजस्व में कमी का प्रतिनिधित्व करता है. राजकोषीय घाटा देश के आर्थिक विकास और स्थिरता का पता लगाने में मदद करता है. यदि आप एक करदाता, नीति निर्धारक या ऐसे कोई व्यक्ति हैं जो अर्थशास्त्र में रुचि रखते हैं तो , राजकोषीय घाटे को समझना और यह कैसे काम करता है, महत्वपूर्ण है. यह लेख राजकोषीय घाटे का अर्थ, इसके कारणों और इसके परिणामों की स्पष्ट समझ प्रदान करता है.

राजकोषीय घाटा क्या है?

राजकोषीय घाटे का अर्थ  बजट की राशि में कमी होना और सरकार को वह राशि उधार लेने की की आवश्यकता पड़ सकती है. घाटे में वृद्धि करने वाले कारकों में सरकारी खर्च, आर्थिक गिरावट या राजस्व संग्रहण में कमी शामिल है.

सरकार आमतौर पर पूंजी बाजार में बॉन्ड और ट्रेजरी बिल जारी करके उधार लेने के माध्यम से घाटे को फाइनेंस करती है.

राजकोषीय घाटे की गणना कैसे की जाती है?

राजकोषीय घाटा सरकार के राजस्व और व्यय के बीच का अंतर है. जब व्यय अर्जित राजस्व से अधिक हो जाता है तो इसके परिणामस्वरूप कमी होती है. विपरीत स्थिति में, जहां राजस्व व्यय से अधिक होता है, को अधिशेष कहा जाता है.

घाटा निर्धारित करने के लिए गणितीय सूत्र है:

राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – उत्पन्न कुल राजस्व

राजकोषीय घाटे की गणना के लिए यहां एक विस्तृत फॉर्मूला दिया गया है:

राजकोषीय घाटा = (राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्ति) + पूंजी व्यय – (लोन की रिकवरी + अन्य प्राप्तियाँ)

आइए एक सरल उदाहरण के साथ राजकोषीय घाटे के सूत्र को समझते हैं.

मान लीजिए कि एक अवधि के लिए सरकार का खर्च रु. 600 करोड़ था, जबकि इसका राजस्व रु. 400 करोड़  था.

राजकोषीय घाटा = (राजस्व व्यय + पूंजी व्यय) – (राजस्व प्राप्ति + उधार लेने को छोड़कर पूंजी प्राप्ति)

या, राजकोषीय घाटा = रु. (600-400) करोड़ = रु. 200 करोड़

सकल राजकोषीय घाटा: सकल राजकोषीय घाटा अतिरिक्त व्यय है, जिसमें निवल ऋण वसूली, अधिक राजस्व प्राप्तियां (अनुदान सहित) और गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियां शामिल हैं.

निवल राजकोषीय घाटा: यह सकल राजकोषीय घाटा (जीएफडी) है जो केंद्र सरकार के निवल उधार को शून्य करता है.

यह समझना महत्वपूर्ण है कि बजट की कमी में यह स्वतः निहित  नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था बउरे आकार में  है. बजट की कमी तब बढ़ सकती है जब सरकार राजमार्ग निर्माण, हवाई अड्डे निर्माण या भविष्य में राजस्व उत्पन्न करने वाले उद्योगों जैसे दीर्घकालिक विकास के लिए परिसंपत्ति उत्पादन में भारी निवेश करती है. इसलिए राजस्व और व्यय दोनों भागों की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए.

राजकोषीय घाटे का कारण क्या है?

राजकोषीय घाटे में वृद्धि के निम्नलिखित कारण हैं.

  • सरकारी खर्च में वृद्धि-अगर राजस्व आय समान गति पर नहीं बढ़ती है, तो घाटा बढ़ जाएगा.
  • कर प्राप्तियों में गिरावट या अन्य स्रोतों से राजस्व व्यय और आय के बीच अंतर को बढ़ा सकता है.
  • आर्थिक मंदी के दौरान सरकार का राजस्व संग्रह कम हो सकता है. मंदी के दौरान आय बढ़ सकती है जबकि उसके व्यय बढ़ सकते हैं.
  • युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अपना खर्च बढ़ा सकती है.
  • यदि बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सामाजिक कल्याण या सब्सिडी की ओर जाता है तो इससे घाटे की मात्रा बढ़ जाती है.
  • अगर सरकार का ऋण बढ़ता है, तो इसे ब्याज़ में भारी राशि का भुगतान करना पड़ सकता है, जिससे खर्च बढ़ सकता है.

राजकोषीय घाटे की गणना के घटक क्या हैं?

राजकोषीय घाटे की गणना करने के लिए दो प्रमुख भाग हैं:

आय के घटक: यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों से आय का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें सभी कर राजस्व और गैर-कर योग्य वेरिएबल से उत्पन्न आय शामिल हैं.

करों से सरकार की आय में आयकर, निगम कर, सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और माल और सेवा कर (जीएसटी) शामिल हैं.

गैर-कर आय के घटकों में बाहरी अनुदान, ब्याज रसीद, लाभांश, केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) से प्राप्त रसीद और सरकार द्वारा अर्जित लाभ शामिल हैं.

व्यय घटक: व्यय पक्ष में वेतन, पेंशन और आस्तियों, मूल संरचना और स्वास्थ्य देखभाल विकास के लिए किए गए खर्च शामिल हैं.

एफआरबीएम (FRBM)अधिनियम के अनुसार आदर्श राजकोषीय घाटा क्या है?

एफआरबीएम (FRBM)का अर्थ राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन है. इसे वर्ष 2003 में राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तुत किया गया. एफआरबीएम (FRBM)अधिनियम द्वारा 31 मार्च, 2021 के लिए निर्धारित नवीनतम वित्तीय घाटे का लक्ष्य 3% था और केंद्र सरकार के उधार को 2024-25 तक सकल घरेलू उत्पाद के 40% पर सीमित किया जाना था.

राजकोषीय घाटे का संतुलन कैसे किया जाता है?

सरकार के खर्चों और आय के बीच अंतर को समाप्त करने का सबसे सामान्य तरीका निवेशकों को बांड जारी करके बाजार से उधार लेना है. सरकारी बांड या जी-सेक को निवेश का एक अत्यंत सुरक्षित और जोखिम-मुक्त रूप माना जाता है.

राजकोषीय घाटे और कीनेशियाई अर्थशास्त्र

यह समझने के लिए कि राजकोषीय घाटा इतना महत्वपूर्ण क्यों है, आपको जॉन एम. कीन्स द्वारा प्रस्तावित आर्थिक सिद्धांत की जांच करनी चाहिए. कीनेशियाई अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था को विनियमित करने और स्थिर करने के लिए विरोधी राजकोषीय नीतियों पर विश्वास करते हैं. यह प्रस्तावित करता है कि सरकार श्रम-गहन मूल संरचना परियोजनाओं के रूप में विस्तारपूर्वक वित्तीय नीतियों को अपनाती है, सरकारी खर्च बढ़ाती है और करों को कम करती है, नीचे की ओर अर्थव्यवस्था को उत्तेजित करती है. इसी प्रकार, वे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए कर सीमाओं को बढ़ाने की सलाह देते हैं जब महत्वपूर्ण मांग-पक्ष की वृद्धि होती है.

कीनेशियाई सिद्धांत यह तर्क देता है कि मंदी के दौरान राजकोषीय घाटे लाभदायक हो सकते हैं क्योंकि वे अर्थव्यवस्था में पैसे लगाते हैं, नौकरी पैदा करते हैं और उपभोक्ता खर्च को पुनर्जीवित करते हैं. मंदी जैसी स्थिति में, लेसेज-फेयर दृष्टिकोण अर्थव्यवस्था में संतुलन बहाल करने में असफल हो सकता है; सरकार को उसकी आवश्यकताओं को प्रोत्साहन देना चाहिए.

समझने के लिए, लैसेज-फेयर दृष्टिकोण एक वैकल्पिक आर्थिक दर्शन है जो मुक्त बाजार पूंजीवाद को बढ़ावा देता है और सरकारी हस्तक्षेप का विरोध करता है.

बृहत् अर्थशास्त्र पर राजकोषीय घाटे का प्रभाव

सरकार कैसे खर्च करती है और धन निवे,श निवेश करती है, यह देश के बृहत् आर्थिक संकेतकों को प्रभावित करते हैं. जब घाटा बढ़ता है और सरकार उधार लेने का प्रयास करती है, तो यह धन की आपूर्ति और ब्याज दर को प्रभावित करती है.

जब सरकारी उधार लेना बढ़ जाता है तो बाजार में ब्याज दर बढ़ जाती है. उच्च ब्याज दरें निगमों के लिए उधार देने की लागत में वृद्धि करती हैं. इसके परिणामस्वरूप लाभ कम होता है और स्टॉक की कीमत कम होती है.

निष्कर्ष

राजकोषीय घाटे को समझना सरकार की वित्तीय गतिविधियों और समग्र आर्थिक स्वास्थ्य पर उनके प्रभावों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. यह अर्थव्यवस्था और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने वाले व्यय और राजस्व के बीच असंतुलन को दर्शाता है. जबकि इसमें अनेक सकारात्मक पक्ष हैं, वहीं बजट में काफी घाटा चिंता का विषय हो सकता है. दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता और स्थायी आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए राजकोषीय घाटे का विवेकपूर्वक प्रबंधन करना आवश्यक है.

FAQs

राजकोषीय घाटा क्या है?

 

राजकोषीय घाटे का अर्थ सरकार के खर्चों और राजस्व आय के बीच का अंतर है.

राजकोषीय घाटे की गणना करने का फॉर्मूला क्या है?

आप नीचे दिए गए सूत्र का उपयोग करके राजकोषीय घाटे की गणना कर सकते हैं.

राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – उत्पन्न कुल राजस्व

भारत में मौजूदा राजकोषीय घाटे का प्रतिशत क्या है?

वित्तीय वर्ष 23 में भारत का राजकोषीय घाटा 6.4 प्रतिशत था. पिछले वर्ष में यह 6.7% से कम हो गया था.

राजकोषीय घाटे को बढ़ाने के क्या कारण हैं?

यदि सरकार  लंबी अवधि के विकास के लिए परियोजनाओं जैसे राजमार्ग निर्माण, हवाई अड्डे और उद्योग आदि.में में निवेश करती है तो उसका खर्च बढ़ सकता है. इसके अलावा, राजस्व आय में कमी होने पर कमी का अंतर बढ़ सकता है.