अंतरराष्ट्रीय निवेश की बात होने पर अक्सर ADR और GDR जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। ये शब्द आम तौर पर ज्यादा इस्तेमाल नहीं होते, इसलिए शुरुआत में थोड़े जटिल लग सकते हैं। हालांकि, इनका मतलब समझना उतना मुश्किल नहीं है। ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) मुख्य रूप से कंपनियों को विदेशी निवेशकों से पूंजी जुटाने का अवसर देता है।
इसके जरिए विदेशी निवेशक किसी दूसरे देश के शेयर बाजार से सीधे शेयर खरीदने के बजाय उस कंपनी से जुड़े सिक्योरिटीज में निवेश कर सकते हैं। इससे कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय कैपिटल मार्केट तक पहुंच मिलती है, वहीं निवेशकों के लिए भी दुनिया के प्रमुख वित्तीय बाजारों के जरिए विदेशी कंपनियों में निवेश करना आसान हो जाता है।
मुख्य बातें
GDR अंतरराष्ट्रीय बैंकों द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट होते हैं, जो किसी विदेशी कंपनी के शेयरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन शेयरों को कंपनी के अपने देश में मौजूद डोमेस्टिक कस्टोडियन बैंक सुरक्षित रखता है।
GDR के जरिए कंपनियां विदेशी शेयर बाजार में सीधे लिस्टिंग कराए बिना भी विदेशों से पूंजी जुटा सकती हैं और अपने निवेशकों का दायरा बढ़ा सकती हैं।
GDR लंदन और लक्ज़मबर्ग जैसे अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में लिस्ट होते हैं और जरूरत पड़ने पर इन्हें संबंधित कंपनी के मूल (Underlying) शेयरों में बदला भी जा सकता है।
GDR में निवेश करने वाले निवेशकों को करेंसी में उतार-चढ़ाव, लिक्विडिटी और कंपनी के घरेलू देश की राजनीतिक व आर्थिक परिस्थितियों जैसे जोखिमों का भी सामना करना पड़ सकता है।
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) क्या है?
अंतरराष्ट्रीय निवेश से जुड़े विकल्पों को समझते समय अक्सर यह सवाल आता है कि ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) क्या होता है। GDR एक ऐसा वित्तीय साधन (Financial Instrument) है, जिसे किसी विदेशी कंपनी के शेयरों के बदले एक डिपॉजिटरी बैंक जारी करता है। इसमें निवेशक किसी दूसरे देश के शेयर बाजार से सीधे शेयर नहीं खरीदते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लिस्ट GDR में निवेश करते हैं।
डिपॉजिटरी बैंक इन शेयरों को सीधे अपने पास नहीं रखता। ये शेयर कंपनी के अपने देश में मौजूद डोमेस्टिक कस्टोडियन बैंक के पास सुरक्षित रहते हैं, जबकि डिपॉजिटरी बैंक उन्हीं शेयरों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में GDR जारी करता है। उदाहरण के लिए, भारत की कोई कंपनी यूरोप में विदेशी निवेशकों के लिए GDR जारी कर सकती है। इससे विदेशी निवेशकों को भारत में ट्रेडिंग अकाउंट खोले बिना ही उस कंपनी में निवेश करने का मौका मिल जाता है। इसी वजह से कई कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कैपिटल मार्केट तक पहुंच बनाने के लिए GDR का इस्तेमाल करती हैं।
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) कैसे काम करता है?
आमतौर पर GDR की पूरी व्यवस्था डिपॉजिटरी बैंक के माध्यम से संचालित होती है। सबसे पहले कंपनी अपने देश में मौजूद बैंक के पास अपने कुछ शेयर जमा कराती है। इसके बाद डिपॉजिटरी बैंक उन्हीं शेयरों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में GDR जारी करता है। निवेशक सीधे कंपनी के शेयर खरीदने के बजाय इन GDR की खरीद-बिक्री करते हैं।
आमतौर पर GDR की कीमत संबंधित कंपनी के शेयर की कीमत से जुड़ी रहती है। हालांकि, कई बार करेंसी में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार की अन्य परिस्थितियों का भी इसकी कीमत पर असर पड़ सकता है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए दूसरे देश के शेयर बाजार में सीधे ट्रेडिंग करने के बजाय अपने परिचित विदेशी बाजार के जरिए निवेश करना आसान हो जाता है。
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) का उदाहरण
GDR जारी करने का एक सफल उदाहरण Infosys Limited है। वर्ष 2013 में कंपनी ने लक्ज़मबर्ग स्टॉक एक्सचेंज पर 3 करोड़ (30 मिलियन) GDR जारी किए थे। प्रत्येक GDR की कीमत 14.58 अमेरिकी डॉलर थी और यह कंपनी के एक शेयर का प्रतिनिधित्व करता था। इस इश्यू के लिए JP Morgan Chase Bank डिपॉजिटरी बैंक था। लगभग 437 मिलियन अमेरिकी डॉलर के इस इश्यू ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारतीय शेयर बाजार में सीधे ट्रेडिंग किए बिना Infosys में निवेश करने का अवसर दिया। इससे कंपनी अपने निवेशकों का दायरा बढ़ाने, लिक्विडिटी मजबूत करने और वैश्विक निवेशकों तक पहुंच बनाने में सफल रही।
हाल के वर्षों में कई अन्य भारतीय कंपनियों ने भी अंतरराष्ट्रीय कैपिटल मार्केट से पूंजी जुटाने के लिए GDR जारी किए हैं। इनमें प्रमुख नाम हैं:
- एक्सिस बैंक लि.
- GAIL (India) Ltd.
- लार्सन एंड ट्यूब्रो लि.
- महिन्द्रा & महिन्द्रा लि.
- रिलायंस इंडस्ट्री लि.
- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) की व्यवस्था कैसे काम करती है?
"ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट" नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें डिपॉजिटरी बैंक किसी विदेशी कंपनी की ओर से GDR जारी करता है। जब कोई कंपनी GDR जारी करना चाहती है, तो वह एक अंतरराष्ट्रीय डिपॉजिटरी बैंक और अपने देश में मौजूद एक लोकल कस्टोडियन बैंक के साथ मिलकर काम करती है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार होती है।
- अंडरलाइंग शेयर जमा करना: GDR जारी करने वाली कंपनी अपने देश में स्थित डोमेस्टिक कस्टोडियन बैंक के पास अपने तय संख्या में शेयर जमा कराती है।
- GDR जारी करना: लोकल कस्टोडियन बैंक से पुष्टि मिलने के बाद विदेशी (Offshore) डिपॉजिटरी बैंक उन शेयरों के स्वामित्व (Ownership) का प्रतिनिधित्व करने वाले GDR विदेशों में जारी करता है।
- शेयरों की कस्टडी और कन्वर्जन: मूल (Underlying) शेयर डोमेस्टिक कस्टोडियन बैंक के पास सुरक्षित रहते हैं, जबकि GDR की ट्रेडिंग अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में होती है। यदि GDR धारक चाहें, तो वे अपने GDR डिपॉजिटरी बैंक को लौटाकर उन्हें वास्तविक शेयरों में बदल सकते हैं।
GDR की प्रमुख विशेषताएं
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) में कई ऐसी विशेषताएं होती हैं, जो कंपनियों और निवेशकों, दोनों को आकर्षित करती हैं।
- करेंसी: GDR आमतौर पर अमेरिकी डॉलर (USD) या यूरो (EUR) में जारी किए जाते हैं, जिससे दुनिया भर के निवेशकों के लिए इनमें निवेश करना आसान हो जाता है।
- जारी करने वाली संस्था: GDR किसी विदेशी कंपनी की ओर से एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था (डिपॉजिटरी बैंक) द्वारा जारी किए जाते हैं।
- अंडरलाइंग शेयरों का प्रतिनिधित्व: GDR किसी विदेशी कंपनी के शेयरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि वास्तविक शेयर डोमेस्टिक कस्टोडियन बैंक के पास सुरक्षित रहते हैं।
- डिविडेंड का भुगतान: GDR धारकों को डिविडेंड विदेशी करेंसी में मिलता है। इसका भुगतान डिपॉजिटरी बैंक, संबंधित कंपनी से मिलने वाले डिविडेंड के आधार पर करता है।
- कन्वर्जन की सुविधा: स्थानीय सीमा-पार पूंजी (Cross-border Capital) से जुड़े नियमों के अनुसार GDR को वास्तविक शेयरों में बदला जा सकता है।
- रेग्यूलेटरी कंप्लायंस: GDR को जारी करने और उनकी ट्रेडिंग के दौरान कंपनी के अपने देश (जैसे भारत में SEBI के नियम) और जिस विदेशी देश में उनकी ट्रेडिंग होती है, वहां के नियमों का पालन करना होता है।
- इलेक्ट्रॉनिक और ट्रांसफरेबल: GDR को इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखा जा सकता है और इन्हें एक निवेशक से दूसरे निवेशक को आसानी से ट्रांसफर किया जा सकता है।
- अप्रत्यक्ष वोटिंग अधिकार: GDR धारक सीधे वोटिंग नहीं कर सकते। वोटिंग अधिकार डिपॉजिटरी बैंक के पास होते हैं, जो आमतौर पर GDR धारकों के निर्देशों या मैनेजमेंट प्रॉक्सी एग्रीमेंट के आधार पर वोट करता है।
GDR में निवेश करने से पहले किन बातों का ध्यान रखें?
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) में निवेश करने से पहले निवेशक केवल कंपनी ही नहीं, बल्कि बाजार से जुड़े कई दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देते हैं। चूंकि GDR की ट्रेडिंग अंतरराष्ट्रीय बाजार में होती है, जबकि उसके अंडरलाइंग शेयर किसी दूसरे देश के घरेलू बाजार से जुड़े होते हैं, इसलिए करेंसी में उतार-चढ़ाव निवेश से मिलने वाले रिटर्न को प्रभावित कर सकता है।
कई बार कंपनी के शेयर की कीमत स्थिर रहने के बावजूद एक्सचेंज रेट में बदलाव के कारण निवेशकों के रिटर्न पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा लिक्विडिटी भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। कुछ GDR में अच्छी ट्रेडिंग होती है, जबकि कुछ में ट्रेडिंग वॉल्यूम कम होता है। कम लिक्विडिटी के कारण कीमत और खरीद-बिक्री, दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
निवेशक आमतौर पर इन बातों की भी समीक्षा करते हैं:
- रेग्यूलेटरी स्थितियां
- विदेशी बाजार से जुड़े जोखिम
- राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रम
- अलग-अलग देशों में लागू टैक्स नियम
एक और बात ध्यान देने योग्य है कि कई बार GDR की कीमत और कंपनी के घरेलू शेयर की कीमत एक जैसी दिशा में नहीं चलती। इसकी वजह यह है कि अलग-अलग बाजार किसी खबर या निवेशकों की धारणा (Investor Sentiment) पर अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं।
GDR के फायदे
अंतरराष्ट्रीय पूंजी तक पहुंच: GDR के जरिए कंपनियां विदेशी शेयर बाजार में सीधे लिस्टिंग कराए बिना भी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पूंजी जुटा सकती हैं।
बेहतर लिक्विडिटी: अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार में लिस्टिंग होने से शेयरों की लिक्विडिटी बढ़ सकती है, जिससे वैश्विक निवेशकों के लिए उनकी खरीद-बिक्री आसान हो जाती है।
निवेशकों का बड़ा दायरा: GDR कंपनियों को अलग-अलग देशों के निवेशकों तक पहुंचने का अवसर देता है, जिससे केवल घरेलू निवेशकों पर निर्भरता कम होती है।
कम लागत में विदेशी पूंजी जुटाना: पारंपरिक क्रॉस बॉर्डर IPO के जरिए किसी विदेशी शेयर बाजार में सीधे लिस्टिंग कराने की तुलना में GDR जारी करना आमतौर पर कम खर्चीला होता है और रेग्यूलेटरी बोझ भी अपेक्षाकृत कम होता है।
ब्रांड को मजबूती: GDR के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूदगी कंपनी के वैश्विक ब्रांड और विश्वसनीयता को मजबूत बना सकती है।
करेंसी हेजिंग का फायदा: यदि GDR अमेरिकी डॉलर (USD) या यूरो (EUR) जैसी प्रमुख करेंसी में जारी किए गए हैं, तो निवेशकों को करेंसी हेजिंग का भी फायदा मिल सकता है और घरेलू करेंसी के कमजोर होने का असर कुछ हद तक कम हो सकता है।
बेहतर वैल्यूएशन की संभावना: अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार में लिस्टिंग से कंपनी को बड़े और अधिक अनुकूल बाजार तक पहुंच मिलती है, जिससे उसका वैल्यूएशन बेहतर हो सकता है।
बेहतर प्रतिष्ठा: GDR जारी करना इस बात का संकेत माना जाता है कि कंपनी वैश्विक स्तर पर विस्तार के लिए प्रतिबद्ध है। इससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच उसकी साख मजबूत होती है।
GDR के नुकसान
कई फायदों के बावजूद GDR से जुड़े कुछ नुकसान भी हैं।
- करेंसी जोखिम: करेंसी में उतार-चढ़ाव का असर GDR की कीमत पर पड़ सकता है। जब इसकी वैल्यू को कंपनी की घरेलू अकाउंटिंग करेंसी में बदला जाता है, तो निवेश का मूल्य प्रभावित हो सकता है।
- रेग्यूलेटरी कंप्लायंस की लागत: GDR जारी करने वाली कंपनियों को कई देशों के नियमों का पालन करना पड़ता है, जिससे कंप्लायंस पर होने वाला खर्च बढ़ जाता है।
- लिक्विडिटी का जोखिम: कुछ कंपनियों के GDR में घरेलू शेयरों की तुलना में कम ट्रेडिंग होती है। इससे Bid-Ask Spread बढ़ सकता है और खरीद-बिक्री करना मुश्किल हो सकता है।
- अप्रत्यक्ष वोटिंग अधिकार: GDR धारकों के पास आमतौर पर सीधे वोटिंग का अधिकार नहीं होता। वे केवल डिपॉजिटरी बैंक के जरिए प्रॉक्सी निर्देशों (Proxy Instructions) के माध्यम से ही वोटिंग प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं।
- घरेलू बाजार की तुलना में ज्यादा लागत: घरेलू बाजार से पूंजी जुटाने की तुलना में GDR जारी करना आमतौर पर अधिक महंगा होता है, क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय अंडरराइटिंग, कानूनी फीस और कंप्लायंस से जुड़े अतिरिक्त खर्च शामिल होते हैं।
- सीमित बाजार तक पहुंच: कुछ बाजारों में GDR केवल खास श्रेणी के निवेशकों, जैसे क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs), के लिए उपलब्ध होते हैं। इससे रिटेल निवेशकों की भागीदारी सीमित हो सकती है।
- देश से जुड़ा जोखिम: GDR धारकों को कंपनी के घरेलू देश की राजनीतिक, आर्थिक और रेग्यूलेटरी परिस्थितियों से जुड़े जोखिमों का भी सामना करना पड़ता है।
- टैक्स से जुड़ी जटिलताएं: GDR पर मिलने वाले डिविडेंड पर अलग-अलग देशों के टैक्स नियम लागू हो सकते हैं। हालांकि, डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट्स (DTAA) और फॉरेन टैक्स क्रेडिट जैसी व्यवस्थाओं की वजह से दोहरी टैक्स देनदारी की संभावना आमतौर पर कम हो जाती है।
GDR, ADR और IDR में अंतर
GDR को बेहतर तरीके से समझने के लिए इसकी तुलना इससे मिलते-जुलते दूसरे वित्तीय साधनों, यानी अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) और इंडियन डिपॉजिटरी रिसीट्स (IDR) से की जा सकती है।
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तुलना का आधार |
GDR |
ADR |
IDR |
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ट्रेडिंग की सुविधा |
दुनिया के कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ट्रेड किए जा सकते हैं |
केवल अमेरिका में ट्रेड किए जा सकते हैं |
केवल भारत में ट्रेड किए जा सकते हैं |
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करेंसी |
आमतौर पर USD या EUR |
USD |
INR |
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कहां जारी किए जाते हैं? |
यूरोप और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में |
अमेरिकी बाजार में |
भारतीय बाजार में |
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उद्देश्य |
कंपनियों को दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय निवेशकों तक पहुंच उपलब्ध कराना |
अमेरिकी निवेशकों को विदेशी कंपनियों के शेयरों में निवेश का मौका देना |
भारतीय निवेशकों को विदेशी कंपनियों के शेयरों में निवेश का मौका देना |
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मुख्य एक्सचेंज |
लंदन स्टॉक एक्सचेंज, लक्ज़मबर्ग स्टॉक एक्सचेंज |
NYSE, NASDAQ |
NSE, BSE |
नोट: भारत में IDR बाजार फिलहाल सक्रिय नहीं है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड PLC एकमात्र कंपनी थी, जिसने IDR जारी किए थे। इन्हें वर्ष 2020 में डीलिस्ट कर दिया गया। हालांकि, IDR से जुड़ा रेग्यूलेटरी फ्रेमवर्क अभी भी मौजूद है, लेकिन फिलहाल भारत में कोई भी IDR लिस्टेड नहीं है।
निष्कर्ष
ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट (GDR) उन कंपनियों और निवेशकों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करता है, जो अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार तक पहुंच बनाना चाहते हैं। इसकी मदद से निवेशक किसी विदेशी कंपनी के शेयर सीधे खरीदने के बजाय, दूसरे देश के मान्यता प्राप्त शेयर बाजारों में लिस्टेड GDR के जरिए निवेश कर सकते हैं。
GDR कंपनियों को विदेशी निवेशकों तक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय बाजार से पूंजी जुटाने का अवसर देता है। वहीं, निवेशकों के लिए यह घरेलू बाजार से बाहर अपने निवेश में डाइवर्सिफिकेशन लाने का एक अतिरिक्त विकल्प बनता है। हालांकि, निवेश का फैसला लेते समय करेंसी में उतार-चढ़ाव, लिक्विडिटी और विदेशी बाजारों की परिस्थितियों जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। GDR की मूल संरचना और काम करने के तरीके को समझ लेने के बाद इनका विश्लेषण करना और निवेश से जुड़े फैसले लेना काफी आसान हो जाता है।
