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शेयर बाजार का परिचय

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वित्तीय बाजारों के प्रकार और कार्य

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अच्छा, अब आपको पता है कि वित्तीय बाज़ार क्या हैं और यह कैसे काम करते हैं। अब हम इससे आगे बढ़ते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कितने वित्तीय बाज़ार मौजूद हैं?

इस सवाल के जवाब को समझने के लिए हमें पहले वित्तीय बाज़ारों के वर्गीकरण के तरीकों के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल करनी चाहिए। वित्तीय बाज़ार का मतलब सामूहिक रूप से फ़ाइनेंशियल एसेट्स की खरीद-बिक्री के लिए इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग तरीकों से है। इसलिए विशेषज्ञों ने कई मानदंडों के आधार पर बाज़ारों को व्यापक रूप से अलग अलग वर्गों में बाँटा है।

यहां उन चार मुख्य मानदंडों पर एक नज़र डालते हैं, जो यह तय करते हैं कि आप किस प्रकार के वित्तीय बाज़ार में काम कर रहे हैं। आइए इन चार मूलों के आधारित 8 प्रकार के वित्तीय बाज़ारों के बारे में जानते हैं।

क्लेम की  प्रकृति के आधार पर

वित्तीय बाज़ारों को निवेश की गई संपत्ती पर आपके क्लेम या दावे की प्रकृति के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। आपके निवेश पर आपका क्लेम इन दो में से कोई एक प्रकार का हो सकता है: फिक्सड या रिसिड्यूअल। इसके माध्यम से दो प्रकार के वित्तीय बाज़ारों के मार्ग खुलते हैं, जो नीचे दिए गए हैं।

डेट मार्केट 

डेट बाज़ार में डेट इंस्ट्रूमेंट्स या साधन जैसे बॉन्ड और डिबेंचर्स की खरीद-बिक्री की जाती है। ये इंस्ट्रूमेंट्स कंपनियों और सरकारी संस्थानों द्वारा जारी होते हैं। और जब आप ये इंस्ट्रूमेंट्स खरीदते हैं तो उस संस्थान की संपत्ति पर आपका क्लेम तय हो जाता है। यानी इसमें राशि एक हद तक सीमित रहती है।

उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए कि आप ₹5000 के फेस वैल्यू और 10 प्रतिशत कूपन रेट वाले एक बॉन्ड में निवेश करते हैं। तो आपको प्रति वर्ष ₹500 (₹5000 का 10 प्रतिशत) की निश्चित राशि प्राप्त होगी।

इक्विटी मार्केट 

इस मार्केट में पब्लिक लिमिटेड कंपनियों के शेयर का कारोबार होता है। यहां आप कई तरह की ट्रेडिंग कर सकते हैं जैसे इंट्राडे ट्रेडिंग, डिलीवरी ट्रेड, इनिशियल पब्लिक ऑफर्स (आईपीओ) और फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर्स (एफपीओ)। आपके द्वारा इक्विटी मार्केट से खरीदे गए शेयरों पर आपका क्लेम रिसिड्यूअल होता है 

इसका मतलब है कि आप जब किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो आप प्रभावी रूप से उस कंपनी के शेयरधारक बन जाते हैं। जब कंपनी कारोबार बंद कर कंपनी बेच देती है तो सभी शेयरधारकों को देनदारियों के बाद उनके शेयर के हिसाब से भुगतान किया जाता है।

क्लेम की मैच्योरिटी के आधार पर  

किसी व्यक्ति के घर में अगर बगीचा है तो वह आपको बता सकता है कि सभी पौधे एक क्रम में बढ़ते। कुछ गेंदा की तरह होते हैं तो कुछ ही हफ्तों में खिल जाते हैं, जबकि कुछ हिमालय की लिली के फूल की तरह होते हैं जिन्हें खिलने में सालों लग जाते हैं।

ठीक इसी तरह अलग-अलग निवेश अलग-अलग समय पर रिटर्न देते हैं। मैच्योरिटी की अवधि भी उसी हिसाब से तय की जाती है। किसी पूँजी का कार्यकाल छोटा होता है तो किसी की मैच्योरिटी अवधि लंबी होती है। इस आधार पर दो किस्म के वित्तीय बाज़ार हैं, जैसे:

मुद्रा बाज़ार (मनी मार्केट)

यह ऐसा बाज़ार है जहां ट्रेज़री बिल, कमर्शियल पेपर्स और डिपॉजिट के प्रमाण पत्र जैसी मुद्रा संबंधी एसेट्स की खरीद-बिक्री की जा सकती है। इन एसेट्स में निवेश की सीमा एक साल से अधिक नहीं होती, जिसकी वजह से यहां रिस्क भी बहुत कम है। ब्याज के रूप में यहां रिटर्न दिया जाता है।

पूँजी बाज़ार (कैपिटल मार्केट)

पूँजी बाज़ार या कैपिटल मार्केट में मध्यम और लंबी अवधि के निवेश के साथ एसेट्स का कारोबार होता है। इसमें निवेशक इक्विटी शेयर कैपिटल और प्रेफरेंस शेयर कैपिटल जैसे एसेट्स खरीद सकते हैं और इसे लंबे समय तक अपने पास रख सकते हैं। अब कैपिटल मार्केट भी दो श्रेणियों में विभाजित है, प्राइमरी मार्केट और सेकेंड्री मार्केट।

  • प्राइमरी मार्केट

यहां नई सूचीबद्ध कंपनियां इनिशियल पब्लिक ऑफर्स (आईपीओ) के माध्यम से सिक्योरिटीज़  जारी करती हैं। पहले से सूचीबद्ध कंपनियां भी फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर के माध्यम से नई सिक्योरिटीज़ फिर से जारी कर सकते हैं। प्राइमरी मार्केट में कंपनियों और उनके शेयरधारकों के बीच लेन-देन होता है।

  • सेकेंड्री मार्केट

इस मार्केट में सूचीबद्ध कंपनियों की मौजूदा सिक्योरिटीज़ का स्टॉक एक्सचेंज पर निवेशकों के बीच कारोबार किया जाता है। सेकेंड्री मार्केट में आप रोज़ाना ट्रेडिंग के दौरान या तो शेयर खरीदते हैं या उन्हें बेचते हैं।

 

डिलीवरी समय के आधार पर

यह वर्गीकरण आपके खरीदे गए एसेट की डिलीवरी लेने के समय के आधार पर होता है। सामान्य तौर पर डिलीवरी का काम सिर्फ सेकेंड्री बाज़ार में आता है जहां आप अन्य निवेशकों के साथ फ़ाइनेंशियल एसेट्स का व्यापार करते हैं। इस फैक्टर के आधार पर हमारे पास नक़दी और वायदा बाज़ार है।

नकद बाज़ार (कैश मार्केट)

नकद बाज़ार में लेन-देन वास्तविक समय  के आधार पर निर्धारित होते हैं। नकद बाज़ार में लेन-देन करने के लिए आपको निवेश राशि के भुगतान खरीद या बिक्री के दौरान ही करने की ज़रूरत पड़ेगी। आप चाहें तो खुद की पूँजी का इस्तेमाल करके या उधार ली गई धनराशि से ऐसा कर सकते हैं। इसे मार्जिन मनी के रूप में जाना जाता है।

वायदा बाज़ार (फ्यूचर्स मार्केट)

वायदा बाज़ार में आप  पैसे का भुगतान लेन-देन के समय  ही करते हैं लेकिन एसेट की डिलीवरी बाद में की जाती है। कई मामलों में आपको लेन- देन करते समय एसेट की पूरी कीमत का भुगतान करने की भी ज़रूरत नहीं होती है। इसके अलावा मूल्य का एक प्रतिशत, जिसे मार्जिन के रूप में जाना जाता है, वही काफी होता है। इस बाज़ार में खरीदे और बेचे गए एसेट्स में वायदा और विकल्प फ्यूचर्स और ऑपशंस आते हैं। आने वाले अध्याय में हम इन एसेट्स के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। 

संगठनात्मक संरचना के आधार पर

यह समझने में बहुत ही आसान है। यह लेन-देन के तरीकों और उसके संचालन के आधार पर बाज़ारों का वर्गीकरण है। अब नीचे हम आपको दो प्रकार के वित्तीय बाज़ार के बारे में समझाते हैं।

एक्सचेंज ट्रेडेड मार्केट 

एक्सचेंज ट्रेडेड मार्केट में लेन-देन एक्सचेंज के माध्यम से होता है। यह मुख्य रूप से एक केंद्रीकृत या सेंट्रलाइज़्ड बाज़ार है जिसका संचालन मानकीकृत प्रक्रियाओं पर होता है। यहां विक्रेता और खरीदार एक दूसरे से सीधे तौर पर बातचीत नहीं कर सकते बल्कि उन्हें एक प्रतिनिधि के माध्यम से ट्रेड करना होता है। 

एक्सचेंज ट्रेडेड मार्केट में कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट्स की कोई गुंजाईश नहीं है। इसे आप ई-कॉमर्स साइट की तरह समझ सकते हैं, जहां आप विक्रेता से नहीं मिल सकते।

ओवर-दी-काउंटर मार्केट 

यह एक विकेंद्रीकृत या डिसेंट्रलाइज़्ड बाज़ार है जहां खरीदार और विक्रेता अपनी ज़रूरतों के अनुसार एक दूसरे से संपर्क कर सकते हैं और कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट्स का कारोबार कर सकते हैं। यहां किसी की मध्यस्थता नहीं होती है और लेन-देन इलेक्ट्रॉनिक रूप से काउंटर पर ही होता है।

यह आपके स्थानीय दर्जी की दुकान तरह ही है जहाँ आप व्यक्तिगत रूप से जाकर अपना माप देते हैं ताकि आपको सही माप की पोशाक मिल सके। तो इस उदाहरण से तो इस कॉन्सेप्ट को समझना आसान बन गया होगा, है ना? 

निष्कर्ष 

यहां हमने विभिन्न प्रकार के वित्तीय बाज़ारों और उनके कार्यों के बारे में जाना। अब अगले अध्याय में हम शेयर बाज़ार के प्रमुख प्लेयर्स के बारे में पढ़ेंगे। पढ़ते रहें और सीखते रहें।

अब तक आपने पढ़ा

  • वित्तीय बाज़ारों को इन चार मापदंडों में से किसी एक के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है : क्लेम की प्रकृति, क्लेम की मैच्यूरिटी ऑफ, डिलीवरी समय और संगठनात्मक संरचना।
  • क्लेम की प्रकृति के अनुसार 2 तरह के बाज़ार होते हैं,  डेट बाज़ार, जहां डेट इंस्ट्रूमेंट्स का कारोबार होता है और इक्विटी बाज़ार, जहां शेयरों का कारोबार होता है।
  • क्लेम की मैच्यूरिटी के अनुसार 3 तरह के बाज़ार हैं,  मुद्रा बाज़ार, जहां शॉर्ट टर्म इंस्ट्रूमेंट्स का कारोबार होता है और पूँजी बाज़ार, जहां मध्यम अवधि और लंबी अवधि के लिए एसेट्स का कारोबार होता है।
  • पूँजी बाज़ार (कैपिटल मार्केट) प्राइमरी या सेकेंड्री हो सकते हैं।
  • डिलीवरी समय के आधार पर, बाज़ार या तो नकद बाज़ार हो सकते हैं, जहां एसेट की डिलीवरी वास्तविक समय होता है, या वायदा बाज़ार हो सकते हैं, जहां वितरण बाद की तारीख में होता है।
  • संगठनात्मक संरचना के आधार पर भी 2 प्रकार के बाज़ार मौजूद हैं, एक्सचेंज-ट्रेडेड मार्केट वह है, जहां एसेट का कारोबार एक एक्सचेंज पर होता है और ओवर-द-काउंटर बाज़ार वो है जहां ऐसेट का काउंटर पर विकेंद्रीकृत तरीके से कारोबार किया जाता है।
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